पुणे न्यूज डेस्क: तलेगांव दाभाडे में चुनावी मौसम आमतौर पर स्थानीय लोगों के लिए अस्थायी रोजगार और अतिरिक्त कमाई का बड़ा मौका होता है, लेकिन इस साल स्थितियां बदली हुई दिख रही हैं। इलाके में निर्विरोध चुनावों के चलते कामकाज से जुड़े कई अवसर लगभग खत्म हो गए हैं। शहर की आबादी भले एक लाख के पार पहुंच गई हो, पर बाजारों में ग्राहकी का स्तर काफी नीचे चला गया है। इससे व्यापारी, छोटे व्यवसायी और दिहाड़ी श्रमिकों में निराशा साफ झलक रही है।
जीजामाता चौक का मजदूर अड्डा रोज सुबह सैकड़ों श्रमिकों से भर जाता है, लेकिन मांग न होने के कारण ज्यादातर खाली हाथ लौट रहे हैं। कर्नाटक, बिहार, यूपी और महाराष्ट्र के कई जिलों से आए मजदूर बताते हैं कि पिछले महीने से उन्हें ठेकेदारों से काम नहीं मिल रहा। कुछ महिलाओं ने कहा कि वे चुनाव से जुड़े किसी भी काम के लिए तैयार थीं—लेकिन इस बार चुनावी तैयारियां ही गायब हैं, तो रोजगार कहां से मिलेगा?
दूसरी तरफ, मजदूरों के पास दिहाड़ी नहीं है लेकिन शहर के सोना-चांदी, मोबाइल और शराब के दुकानदारों के पास त्योहारों जैसी भीड़ उमड़ रही है। आर्थिक रूप से तलेगांव अब तालुके का प्रमुख केंद्र बन चुका है, जहां 40 से अधिक राष्ट्रीय बैंक और कई क्रेडिट सोसायटियां कारोबार बढ़ाने के लिए ऋण देती हैं। शादी-ब्याह और चुनावी गतिविधियां यहां के व्यवसायियों को अच्छा सीजनल लाभ देती थीं, मगर निर्विरोध चुनावों की वजह से उनका अहम हिस्सा सीधे छिन गया है।
चुनावी सामग्रियों जैसे गुलाल, फूल-मालाएं, झंडे, खादी शर्ट और फेटे की बिक्री इस बार लगभग ठप है। ढोल-ताशा पथकों को भी कार्यक्रम नहीं मिल रहे। तलेगांव में करीब 35 कैटरर हैं, जिन्हें हर चुनाव में रैलियों और सभाओं के ऑर्डर मिलते थे, लेकिन इस बार संख्या बहुत कम रह गई है। कुल मिलाकर, स्थानीय अर्थव्यवस्था का वह हिस्सा जो चुनावी गतिविधियों पर निर्भर रहता था, इस बार भारी मंदी का सामना कर रहा है।